कबन्ध और छिन्नमस्ता का शब्दबोध, अर्थतात्विक बोध समझने के लिए वैदिक साहित्य और आगम साहित्य का अध्ययन आवश्यक हो जाता है।  छिन्नमस्ता का शाब्दिक अर्थ है--कटे हुए शिर वाली देवी।  इस अभिधान का गूढ़ रहस्य वेदों द्वारा उद् घाटित होता है।  शतपथ ब्राह्मण (१।१।२) के अनुसार सृष्टि का मूलयज्ञ पाँच भागों में विभक्त हैं

  • १.  पाकयज्ञ,  
  • २.  हविर्यज्ञ,  
  • ३.  महायज्ञ,  
  • ४.  अतियज्ञ,  
  • ५.  शिरोयज्ञ

  • (१)  पाकयज्ञ --पाकयज्ञ  को  स्मात्तयज्ञ भी कहा जाता है।। इसी के ग्रहयज्ञ और एकाग्नि यज्ञ दो रूप और हैं।
  • (२)  हविर्यज्ञ -- अग्निहोत्र यज्ञ,  दर्शपौर्णिमास्य यज्ञ,  चातुर्मास्य यज्ञ और पशुबन्ध यज्ञ हविर्यज्ञ है।
  • (३)  महायज्ञ--भूतयज्ञ,  मनुष्ययज्ञ,  पितृयज्ञ,  देशयज्ञ और ब्रह्मयज्ञ--ये पाँच महायज्ञ हैं।
  • (४)  अतियज्ञ--अग्नि चयन,  राजसूय,  अश्वमेध और वाजपेय--ये चार यज्ञ अतियज्ञ हैं।
  • (५)  शिरोयज्ञ--'छिन्न शीर्षो वै यज्ञः'  श्रुति के इस वचन के अनुसार उपर्युक्त सभी यज्ञ छिन्नशीर्ष--शिर रहित हैं।  सभी का मस्तक कटा हुआ है।  इसलिए पूर्वोक्त चारों यज्ञों के अन्त में 'शिरसन्धान' यज्ञ किया जाता है।  उसी को 'शिरोयज्ञ' कहते हैं।  इस यज्ञ को न करने से  यज्ञ अधूरे शिर रहित रह जाते हैं।  ब्राह्मण ग्रन्थों में शिरोयज्ञ को 'सम्राट्याग',  'प्रवर्ग्ययाग',  'धर्मयाग'  और 'महावीरोपासना' नाम से व्यवहृत किया गया है।  

यज्ञों के मस्तक कटने का अभिप्राय वैदिक साहित्य के अनुसार इस प्रकार है--उपर्युक्त यज्ञों और उनके अवयवों का जो निरूपण किया गया है,  उसमें ब्रह्मयज्ञ (ब्रह्मौदन यज्ञ) और अवर्ग्ययाग का सम्बन्ध छिन्नमस्तक से है।  जिस वस्तु का आत्म से नित्य सम्बन्ध रहता है,  उस समय को 'ब्रह्मौदन' कहा गया है।  वह वस्तु (अन्न) उस ब्रह्म का ओदन है।  उसे केवल ब्रह्म ही ग्रहण कर सकता है,  दूसरा नहीं।  जो वस्तु उस आत्मा से अलग होकर दूसरे का अन्न ओदन बन जाती है,  उसे 'प्रवर्ग्य' कहते हैं।  प्रवर्ग्य का अर्थ उच्छिष्ट (जूठा) है।

इसका विज्ञानसम्मत तात्पर्य यह है कि सूर्य का ताप,  जो सूर्य से सम्बद्ध रहता है,  वह उसका 'ब्रह्मौदन' है और जो ताप सूर्य से अलग होकर ओषधि, वनस्पति तथा प्राणिवर्ग की सृष्टि में  सहायक बनता है,  वह 'प्रवर्ग्य'  है।  इसे और अधिक सरल व्यावहारिक ढंग से इस प्रकार कहा जा सकता है...

सूर्य-ताप में जल रखने से जल तप जाता है,  सूर्यास्त हो जाने पर भी जल गर्म रहता है।  इसका तात्पर्य यह कि सूर्य अपना ताप जल में छोड़ गया है।  रात हो गई है,  तारागण निकले हैं किन्तु हवा गर्म चल रही है--इसका तात्पर्य यह कि सूर्य अपना ताप हवा में छोड़ गया है।  जल और हवा में सूर्य द्वारा ताप को छोड़ जाना ही सूर्य का प्रवर्ग्य (उच्छिष्ट) भाग है।  इसी को 'घर्मभाग' भी कहा गया है।  घर्म का शाब्दिक अर्थ घाम है।  घाम (घर्म) ही का अपभ्रंश घर्म,  गरम या गर्म है।


वस्तुतः सभी सौर पदार्थ सूर्य से पृथक् रहते हैं।  यदि सूर्य अपने इस उच्छिष्ट भाग को न छोड़े तो सृष्टि की उत्पत्ति असंभव है।  इसीलिए वैदिक श्रुति कहती है कि सम्पूर्ण जगत् की रचना उच्छिष्ट से हुई है।  उच्छिष्टात् सकलं जगत्।  यही प्रवर्ग्य भाग,  उच्छिष्ट भाग उस यज्ञ का मस्तक है, वह कट कर जब अलग हो जाता है तो वह यज्ञ 'छिन्नशीर्ष' कहलाता है।  


निष्कर्ष यह कि 'ब्रह्मौदन' से आत्मरक्षा होती है और  'प्रवर्ग्य' से सृष्टि का स्वरूप बनता है।  यही 'प्रवर्ग्य' निगम--आगम की प्रतीक भाषा में कबन्ध कहलता है और उसी कबन्ध पुरुष का महाशक्ति छिन्नमस्ता है।  जो महामाया '#षोडशी' से '#भुवनेश्वरी' बनती हुई संसार का पालन करती है,  वही अन्त काल में 'छिन्नमस्ता'  बनकर संसार का नाश करती है।  छिन्नमस्ता का स्वरूप यह है--पैंतरा बदल कर वह शक्ति सदा खड़ी रहती है।  उसका शिर कटा हुआ है और कटे हुए शिर के कबन्ध से बहते हुए रक्त को खप्पर भर-भर कर वह पी रही है।  वह देवी दिग्वसना--नग्न है।  त्रिनेत्रा है,  हृदय में कोमल पुष्प की माला धारण किए हुए है,  शिर में मणि रूप से नाग बाँधे हुए हैं।

इस स्वरूप के खप्पर,  रक्त,  नाग  और नग्नता  प्रतीकों की 'रहस्य व्याख्या'  पीछे महाकाली,  षोडशी आदि शक्तियों के स्वरूप-तत्व के चिन्तन में की जा चुकी है।  'शाक्त प्रमोद छिन्नमस्ता तन्त्र' में महाशक्ति 'छिन्नमस्ता'  को 'पराडाकिनी' कहा गया है भगवती नाम्ना पराडाकिनी।

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