नामजाप क्या होता है ? अपने जाप वाणीका देहपर होने वाले प्रभाव को जानिऐ !


नाम का महिमा अगाध है यह तो सभी ने सुना हुआ होता है। लेकिन जब हम वास्तव में  सहज ही नामस्मरण का कोईभी मायने ना जानते हुए वास्तव में अनुकरण करते है तब हमारी मापक आध्यात्मिक प्रगति के अनुसार हम कितने समय तक नाम के वलय मे टिक पाते है?  यह सवाल खुद से ही किया जाना चाहिए।

नामस्मरण में ज्यादातर  तारक मंत्र का ही उपयोग किया जाता है।  सांसारिक साधकों को नाम दो  माध्यमों से ही अवगत होता है।


नाम के वलय का क्या मतलब है?

सद्गुरु ने स्वीकार किये हुए साधक ने ;  नामस्मरण करने की अपेक्षा,  नाम स्वदेह में अनुभव करना ज्यादा महत्वपूर्ण है।  तभी उस साधक के मन लय के परे सूक्ष्म जगत में होनेवाले  पदार्पण द्वारा नामशक्ति की कंपन साधक को अर्धजागृतावस्था में अनुभव होतीं हैं।  इसी में से अंत में स्थूल रवैया यानी भौतिकवादी व्यक्ति में से सद्गुरु अनुग्रहित अभिव्यक्ति में साधक का दास में रूपांतरण होता है ;  उस सूक्ष्मतम आत्मसंधान पर रहनेवाले आभामंडल को नाम वलय कहा जाता है।




नामस्मरण की गंभीर भूमिका

सामान्यतः मनुष्य को नामस्मरण का जाप / स्मरण करना ; एक बाह्यवरण की वजह से एक बहुत ही लचीली  एवं मनः शांति के लिए आसान सीधी उपासना अनुभव हो सकती है। जिनको विशेष आध्यात्मिक प्रगति करने की तीव्र उत्सुकता है और जो मुमुक्षु हैं ; ऐसे साधकों के लिए विशेष नामस्मरण उद्देश्य रेखांकित किया गया है।

भौतिक जीवन में कोई भी, कहीं भी,  कैसे भी, व कभी भी नामस्मरण करने पर मनःशांति क्षण भर में मिलना तो स्वाभाविक है परंतु आध्यात्मिक प्रगति होना यह बेहद अलग विषय है और सिर्फ मनःशांति मिलना यह अलग विषय है। आध्यत्मिक प्रगति होने के दृष्टिकोण से संबद्ध साधकों ने नामस्मरण के मायने अच्छी तरह से  समझ लेना चाहिए।


नामस्मरणके मायने क्या हैं ? 

साधक ने जो नामस्मरण करना है उसके अक्षर कम से कम गणना में हों अर्थात नाम या मंत्र जाप के संपूर्ण अक्षरों की संख्या जितनी कम ; उतना नाम घट भरनेके लिए कम समय लगेगा।  औसतन विशेष आध्यात्मिक प्रगति होने के लिए नामस्मरण प्राथमिक रूप में सकल रूप में भले ही हों तो भी अंत में सार्थक होना ही चाहिए।  उसके द्वारा नाम से प्रकट होने वाली सूक्ष्म अभिव्यक्ति का प्रत्यक्ष संबंध नामसाधक के सूक्ष्म देह के साथ  होकर आत्मनंद की आसानी से उपलब्धि होती है।  इस अवस्था में चिरकाल अर्थात औसत 12 साल टिके रहने पर यानी  विश्वसनीय और पारदर्शक , चरित्रसंपन  सद्गुरु सेवा द्वारा  भविष्य में नामस्मरण नहीं करना पड़ता ; वह सहज ही होता है।  उसके हम गवाह भाव से साक्षात्कार करते है।  इसी अवस्था में हम आंतरिक नामस्मरण अनुभव करतें है तो वहीं बाह्य स्वरूप में नाम वलय का अनुभव करतें है।



इसी तरह अपनी अंतर्बाह्यस्थिती सद्गुरूमय होकर साधक परम पद को प्राप्त होने के लिये अग्रेसर और अधिकारी बनता है।  यह सब लंबी अवधि की  योग प्रक्रिया है।। इस आत्म मार्ग में कोई भी 3, 5 अथवा 7 सालों में भी उपरोक्त अनुभव प्राप्त नहीं कर सकता।

मेहनत तो करनी ही होगी,  उसी के साथ महाराज कसौटी भी देखेंगे वो तो अलग ही बात है।  हम सद्गुरु के चरण मज़बूती से पकड़कर रखते हैं तो किसी भी तरह  की  आपदांपूर्ण स्थिति उत्पन्न होने पर भी चिन्तामुक्ति का अनुभव कर सकते हैं।

सार्थक नामस्मरण हो रहा हो तो भगवान को आना ही पड़ता है ; भगवान इस तत्व को कभीभी नजरअंदाज नहीं कर सकते। उन्हें अपना धाम छोड़कर साधक के नाम घट में बैठना ही पड़ता है।  ऐसा नामस्मरण होगा तभी इसी देह से सायुज्य मुक्ति सहज ही प्राप्त है।

इसमें एक बात कृपया हमेशा ध्यान में रखें कि ; नामस्मरण का अनुभव आना यह एक अलग और नामस्मरण करने से आध्यात्मिक प्रगति होना यह एक अलग बात है।  इन दोनों में आकाश पाताल जितना अंतर है। जिसका अनुभव होने पर खुद की जगह अवश्य समझ में आएगी।

नामस्मरण में ज्यादातर तारक मंत्र का ही उपयोग किया जाता है।  सांसारिक साधकों के लिए नाम दो ही माध्यमों से अवगत होता है।
  
नामस्मरण मतलब क्या?

नामस्मरण में ज्यादातर तारक मंत्र का ही उपयोग किया जाता है।  सांसारिक साधकों के लिए नाम दो ही माध्यमों से अवगत होता है।

संसार करना है तो जो ज़रूरी वो है ' वित्त ',  शरीर को चलाना है, तो अन्न का पाचन होने के लिए जरूरी जो है वो है  'पित्त ',  सार्थक नामस्मरण सहज होना है, तो बुद्धिकोट में जिस ज़रूरी लयताल का प्राप्त होना ज़रूरी है, वो है ' चित्त'...! 

' नामस्मरण ' यह शब्द 'नाम + स्मरण' ऐसे  जोड़शब्दो से बना हुआ है।  ' नाम ' यानी  ' आ + नम 'इस में' 'आ' इस नारायण शब्दब्रम्हका  स्वरवाचक  तो, 'नम' यह मन की विपरीत ऊर्ध्वगति है।  उसके द्वारा  ' नाम ' यह त्रिपदी और  त्रिगुणात्मक  आत्मसंधान अवतरित है।

' स्मरण ' यह श्रीमत दासबोध ग्रंथराज के आधार पर नवविधा भक्तीयुक्त आत्मसंकीर्त के प्रतिनिधि है।  उसके द्वारा  ' नामस्मरण ' यानी नारायण का आत्मसंकीर्तन ' यह अर्थ निहित है।


  • १. सद्गुरु अनुग्रहीत नाम
  • २. स्वईच्छित नाम

१. सद्गुरु अनुग्रहीत नाम

सद्गुरु शिष्य परंपरा का पालन करते हुए साधक को महाराज अनुग्रहित करते है।  हर इच्छुक साधक को यह दिव्य उपलब्धियाँ नहीं मिलती।  इसका प्रमुख कारन  पूर्व जन्म में आधी बची हुई नामसाधना पूरी  करने हेतु पुर्नजन्म मतलब सद्गुरु सानिध्यमय भाग्य।

सद्गुरू कृपा के बिना कभी भी किसी को भी भगवान प्राप्त नहीं होते।  इस पारदर्शक  धारणा पर डटे हुए साधकों को महाराज अवश्य ही मार्गदर्शन करते है।


२. स्वईच्छित नाम

ऐसी परिस्थिति में साधक एक भक्त के रूप में उसे जो अच्छा लगता है या आनंद देता हो ऐसे नामस्मरण में खुद को तल्लीन करने का प्रयास करता है।  इसतरह नाम का अर्थ समझनेके लिये बहुत सालों को अनुसरून नामस्मरण चारित्र्य के साथ लगन से और भक्तिमय  तरीके से करनेपर सानिध्य का अनुभव होता है।

आध्यात्मिक  सानिध्य एवं स्वामीभक्ती दिखावेके लिए और सिर्फ ऊपरी तौर पे न हों...........


इसके लिए हम नामस्मरण तीन स्तरों पर कर सकते हैं......!


  • 1.  उपांशु
  • 2.  वाचिक
  • 3.  मानसिक


मानसिक नामस्मरण जाप में जिव्हा, होंठों द्वारा उच्चारण नहीं किया जाता।  इसे  ब्रम्हाण्डिय ध्वनि में परिवर्तित होनेवाला जाप समझीये।  देह को त्यागने की मानसिकता सक्षम होना जरूरी है।  आध्यात्मिक उबंटू का अगर मानसिक जाप में उपयोग किया तो  बहुत ही अच्छा अनुभव प्राप्त होने लगता है।

महाराज कर्मकांड के खिलाफ रहते थे।  मानसिक जाप या मानसपूजा ही प्राधान्य क्रम से स्वामी हमेशा स्वीकारते हैं।

देह के भीतर बसनेवाले सूक्ष्म रवैये का भेद जाननेके लिए नामस्मरण की अंतर्मुखता को समझ लें

1 और 2 कि तुलना में मानसिक नामस्मरण अत्याधिक प्रभावकारक एवं शीघ्र फलदायी है.......... क्योंकि इस जाप से देहबुद्धि का पूर्ण विसर्जन कर सकते है और साधक को आत्मबुद्धि की तरफ मोड़ने में सहायक होता है।

मानसिक जाप करनेवाली वाणी मतलब "मध्यमा".. यानी देहबुद्धि और आत्मबुद्धि के बीच की जो सीधे "पश्चन्ति" वाणी में मानसिक जाप द्वारा जाकर एकरूप होती है।

हृदयस्थ रहनेवाले यं बीजम अनाहत चक्र में से  पश्चन्तिबोध आधिष्ठात्री देवता ईशान रुद्र कृपा से होता है।

'पश्चन्ति' वाणी यानी हॄदयस्थित आत्मवाणी  जिसका मतलब स्वामींजी का अनाहत नाद मतलब " ॐ कार ".

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