स्वस्तिक त्राटक- आर्थिक तंगी से परेशान साधकों के लिए....!


मानसिक, शारीरिक, सामाजिक और आध्यात्मिक पहलूओं की कमियोंको दिखावा कर के छिपा सकते है लेकिन आर्थिक पहलूओंको दिखावा कर के छिपा नहीं सकते l आज की गतिमान जीवनशैली मे दो वक्त की रोटी कमाने के लिए दैनंदिन दिनचर्या मे शरीर खोखला होता जा रहा है l कुछ लोगों को आर्थिक समाधान मिलता है लेकिन ज्यादातर लोग खुद कि ही गलतियोंंसे संर्भमित अवस्था में अयोग्य  निर्णय ले कर फंस जाते है जिसके परिणाम हेतू उनका कार्य पुरा हो नहीं पाता ऐसे समय में स्वस्तिक त्राटक साधना करना अत्यंत बहुमूल्य हो सकता है l

स्वस्तिक का चिन्ह सौंदर्य ,मंगल और भारतीय संस्कृती का अजोड प्रतिक है किसी भी शुभ और मंगल कार्य के आरंभ से पहले हम स्वस्ति मंत्र का जाप करते है l किसीभी आर्थिक कार्य को पुरा करने हेतू हमारे यहाँ कार्य  कि शुरूवात मंगलाचरण से करने कि प्रथा चली आ रही है l आध्यात्मिक साहित्य के महाकवी अपनें गूरथ की शुरवात मंगलाचरणका ऐक श्लोक लिखकर मंगलमुर्ती भगवान का वांङमयीन पुजन करते है l ईस तरह कें श्लोक की रचना करना आम आदमीं के लिऐ कठीण हैं ईसलिये ऋषीयोंने उन्हे चिन्ह दिया और वो चिन्ह है स्वस्तिक... ! यहीं स्वस्तिक चिन्ह मंगलाचरण के स्वरुप मैं आर्थिक कार्यसिद्धी संपन्न हेतु स्वस्तिक त्राटक साधनामें आत्मप्रयोजित किया जाता हैं l


स्वस्तिक यह शब्द ' सु+ अस् ' धातुसे बना हुआ हैं l ' सु ' का मतलब अच्छा, कल्याणमय, मंगलमय और ' अस् ' का मतलब अस्तित्व है. ' स्वस्ति ' का मतलब लक्ष्मीदायक, मंगलमय और कल्याणकारी सत्ता और ईनका प्रतिक हैं स्वस्तिक...! जहां जहां श्री है, शोभा है, सुसंवाद है, प्रेम है, उल्हास है, जीवन का औदार्य है और व्यवहारीक सौंहार्द दिखता हैं वहां वहा सर्वत्र स्वस्ति भावना बसती है l स्वस्ति भावना मै ही मानव का तथा विश्व का सर्वकश विकास समाया हुआ है l स्वस्तिक त्राटक की साधना से लक्ष्मी माता कृपा की अनुभुती सहज और बिना अथक प्रयास से हीं अनुभव होती है l स्वस्तिक यह अतिप्राचीन मानवनें निर्मित किया हुआ सर्वप्रथम धर्म प्रतिक है l प्राचीन मानवनें पुजन किऐ हुऐंं अनेको देवोंकी शक्ती तथा शुभ कामना ईन दोनोंकी संमिश्रीत कामनाओंका प्रतिक हैं स्वस्तिक...!


स्वस्तिक चिन्ह कें सुक्ष्म त्राटक आत्मविश्लेषण...!

एक खडी रेषा और उसीकी लंबाई जितनी दुसरी अडी रेषा यह स्वस्तिककी मुल आकृती है l खडी रेषा यहं ज्योतिलिंग दर्शन है l ज्योतिलिंग विश्व के निर्माणका मुल कारण है l अडी रेषा यहा विश्व का विस्तार जताती है l ईश्वरने ही विश्व का निर्माण कीया l और देवोंने खुदकी शक्तीसे उसका विस्तार किया l ऐसा स्वस्तिक का मुल भावार्थ है l ऐकमेव ऐवं अद्वीतीय ब्रम्ह विश्वरुपमें विस्तारीत हुऐ यह स्वस्तिक की खडी ऐवं आडी रेखाऐ स्पष्टरुपसे दर्शाती है l यही मुल स्वस्तिक holy cross के माध्यमसे आज ख्रिश्चन लोगोंकी उपासानामें दिखाई देता है l ईसका अर्थ यही है की, holy cross के चिन्ह का निर्माण हिंदू धर्म की स्वस्तिक का मंगलदायी प्रतिमासे प्रेरणा लेकर साकार हुआ है l स्वस्तिक की निर्मिती येशु क्रीस्त के cross के निर्माण के हजारो साल पहले हुई है l

स्वस्तिक की चार भुजाओं का मतलब भगवान विष्णु के चार हात है l भगवान विष्णू स्वयं चारो हाथोंसे चारो दिशाओंका पालनपोषण करते है l भगवान के चारो हाथ हमें सहायता करते है l तथा चारों दिशाऐं हमैं हमारी कार्यक्षेत्रकीं कक्षाऐं दर्शाती है l हमारें ज्ञानकोष मैं लिखा हुआ है की स्वस्तिक सर्वतो भद्रा l स्वस्तिक याने सर्व दिशाओंसे सर्वत्र कल्याण ऐसा ईस प्रतिक ( चिन्ह ) का भाव है, सभी का मंगल हो ऐसा सिर्फ कहनें भरसें नही बल्की खुद स्वस्तिक त्राटक साधना कें माध्यमसें कार्यसमापन करकें दुसरोंको भी लाभान्वयित करने हेतु प्रेरित करना है l

त्राटक साधना के माध्यमसें स्वस्तिक में देश ऐवं काल का मिलनयोग दिखाई देता है l स्वस्तिक का मध्यबिंदु यह देश ऐवं काल का मिलनबिंदु है l देश ऐवं काल दोनोहीं सापेक्ष तत्व हैं l परमात्मा के पास पोहोंचने वाले मनुष्यकों देश ऐवं काल का बंधन नही जकड सकता l देश काल में जो आनंद मिलता है वही सच्चा आनंद है जिसकी अनुभूती मनुष्य को सहजा समाधी के क्षण ही प्राप्त हो सकती है l स्वस्तिक का मध्यबिंदु यह भगवान विष्णू का नाभी कमल ऐवं ब्रम्ह का उत्पत्ती स्थान है l उसी अर्थ से स्वस्तिक सृजन का प्रतिक भी है l स्वस्तिक के पिछे श्री विद्यायुक्त परमलक्ष्मी दायक मंगलमय सद्भावना छिपी हुई है l 

विवाह प्रसंग मैं स्वस्तिक का मांगल्य साक्ष होता है l ईससे समृद्धी ऐवं संपन्नता का भाव दर्शाया जाता है l चातुर्मास मैं सुहागनोंने स्वस्तिक व्रत करना चाहीऐ l ईससें समृद्धीकारक योग बन जातें है l घरों के दरवाजोंकी चौखटपर स्वस्तिक का चिन्ह बनानेकीं परंपरा रही है l जिससे सौभाग्यदायी लक्ष्मीजीका आवाहन सहजही होता है l ऐसी मंगलमय धारणा है l भारतीय नारी के मंगल भावनाओंका मुर्तीमंत प्रतिक है यह स्वस्तिक...!

ऐसे स्वस्तिक त्राटक विद्या योग साधना करनेसे विष्णूपत्नी लक्ष्मीजींका आवाहन बहुत ही सुलभ होता है l घरमें होनेवाले कष्टोंके समुल निराकरण हेतु सभी तत्वोंको सुजबुझ के साथ आपनाना चाहिऐ l जिससे की, स्वयं ही सर्व दुःखोपर मात कर सकतें है l ऐवं समृद्धी व सौख्य घरमें निवास कर सकेंगे l

आर्थिक परेशानिओंसे जुंजनेवाले मनुष्योंने यह साधना करनी चाहीऐ. ईस साधना की अधिक जानकारी के लिऐ दत्तप्रबोधिनी सेवा ट्रस्ट संस्थमें संपर्क किजीऐ. चारो पुरुषार्थोंका ( धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ) आधारस्थान है यह स्वस्तिक त्राटक साधनायोग...! जवान अथवा प्रौढ वर्गभी सहजहीं यह साधना कर सकतें है l

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