ऐसें आते है मृत्यू कें गुप्त संकेत. ध्यानसे सुनोगे तो समझोगे.



मृत्यु... यह एक ऐसा सत्य है जिससे कोई भी मनुष्य बच नहीं सकता। फिर भी यह संसार का सबसे बड़ा रहस्य बना हुआ है। हर व्यक्ति जानना चाहता है कि मृत्यु के बाद क्या होता है, आत्मा कहाँ जाती है और क्या मृत्यु आने से पहले कोई संकेत मिलते हैं?


सनातन धर्म के प्राचीन ग्रंथों कठोपनिषद, शिवपुराण और गरुड़ पुराण में इन प्रश्नों के अद्भुत उत्तर मिलते हैं। इन ग्रंथों के अनुसार मृत्यु अचानक नहीं आती, बल्कि वह अपने आगमन से पहले अनेक संकेत देती है। जो व्यक्ति इन संकेतों को समझ लेता है, वह जीवन के वास्तविक उद्देश्य को पहचान सकता है।



कठोपनिषद में नचिकेता और यमराज का संवाद अत्यंत प्रसिद्ध है। नचिकेता ने यमराज से वही प्रश्न पूछा था जो आज भी मानवता को बेचैन करता है "मृत्यु के बाद क्या होता है?" यमराज ने उसे बताया कि आत्मा कभी नहीं मरती। केवल शरीर बदलता है, जबकि आत्मा अपनी यात्रा जारी रखती है।


शिवपुराण में वर्णन मिलता है कि मृत्यु से कई महीने पहले शरीर और इंद्रियों में विशेष परिवर्तन दिखाई देने लगते हैं। व्यक्ति की दृष्टि कमजोर होने लगती है, शरीर का रंग बदल सकता है और कई बार उसे अपनी ही छाया विचित्र दिखाई देती है। जैसे-जैसे मृत्यु निकट आती है, शरीर की जीवन शक्ति धीरे-धीरे कम होने लगती है।



गरुड़ पुराण में एक रोचक कथा आती है जिसमें यमराज बताते हैं कि वे प्रत्येक मनुष्य को मृत्यु से पहले चार पत्र भेजते हैं। पहला पत्र है बालों का सफेद होना। दूसरा पत्र है दाँतों का गिरना। तीसरा पत्र है आँखों की रोशनी का कम होना और चौथा पत्र है शरीर के प्रमुख अंगों का कमजोर पड़ना। लेकिन अधिकांश लोग इन संकेतों को सामान्य वृद्धावस्था समझकर अनदेखा कर देते हैं।


यमराज यह भी बताते हैं कि मनुष्य के सामने हमेशा दो मार्ग होते हैं एक प्रेय अर्थात भोग और आकर्षण का मार्ग, तथा दूसरा श्रेय अर्थात ज्ञान और आत्मबोध का मार्ग। जो व्यक्ति केवल सांसारिक सुखों में उलझा रहता है, वह जीवन के वास्तविक उद्देश्य से दूर हो जाता है। लेकिन जो आत्मज्ञान की खोज करता है, वह मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है।



गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा तुरंत अपनी यात्रा शुरू करती है। अगले तेरह दिनों तक वह अपने परिवार और घर के आसपास रहती है। इसी कारण हिंदू धर्म में तेरहवीं और पिंडदान का विशेष महत्व माना गया है। इन कर्मों का उद्देश्य आत्मा की यात्रा को सुगम बनाना बताया गया है।


यमराज का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि हम यह शरीर नहीं हैं। शरीर केवल एक रथ है। आत्मा उसका स्वामी है, बुद्धि सारथी है, मन लगाम है और इंद्रियाँ घोड़े हैं। यदि मन और इंद्रियाँ नियंत्रण में हों तो जीवन की यात्रा सही दिशा में आगे बढ़ती है, अन्यथा मनुष्य भ्रम और दुख के मार्ग पर चला जाता है।



मृत्यु कोई अंत नहीं है। यह केवल एक अध्याय का समापन है और दूसरे अध्याय की शुरुआत। इसलिए मृत्यु के संकेतों से डरने की आवश्यकता नहीं है। बल्कि उन्हें जीवन को अधिक सार्थक बनाने के अवसर के रूप में देखना चाहिए।


यदि आज आपको यह पता चल जाए कि जीवन सीमित है, तो आप कौन-सा अधूरा कार्य सबसे पहले पूरा करेंगे? यही प्रश्न हमें जीवन का वास्तविक मूल्य समझाता है। ध्यान से सुनोगे तो समझोगे कि मृत्यु का रहस्य वास्तव में जीवन को सही ढंग से जीने की शिक्षा देता है।



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